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नई दिल्ली। जमीयत उलमा-ए-हिंद के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आज मदनी हॉल, दफ़्तर जमीयत उलमा-ए-हिंद में मुफ़्ती ए आज़म हिंद हज़रत मुफ़्ती मोहम्मद किफायतुल्लाह देहलवी ؒ पर दो दिवसीय सेमिनार का विधिवत शुभारंभ हुआ। पहली बैठक की अध्यक्षता दारुल उलूम देवबंद के शेखुल हदीस एवं मोहतमिम मौलाना मुफ़्ती अबुल क़ासिम नौमाऩी ने की, जबकि दूसरी बैठक की अध्यक्षता मौलाना रहमतुल्लाह मीर कश्मीरी, अध्यक्ष मजलिस कायमा जमीयत उलमा-ए-हिंद ने की। संचालन मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी और संयुक्त संयोजक मौलाना ज़ियाउल हक़ खैराबादी ने किया। सेमिनार के कन्वीनर मौलाना मुफ़्ती मोहम्मद सलमान मंसूरपुरी ने कार्यक्रम का परिचय प्रस्तुत किया।
मौलाना महमूद असअद मदनी का उद्घाटन भाषण
संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद असअद मदनी ने कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिंद की स्थापना वास्तव में एक क्रांतिकारी कदम था, जिसने 1857 और उसके बाद की आज़ादी की जद्दोजहद में शामिल उलेमा की सोच को साकार किया। उन्होंने बताया कि हज़रत शेख़ुल हिंदؒ के प्रमुख शागिर्दों में मुफ़्ती ए आज़म मुफ़्ती किफायतुल्लाह देहलवीؒ विशेष स्थान रखते थे। उनका ज्ञान, तफ़क़्क़ुह, राजनीतिक समझ और दूरदृष्टि सभी वर्गों में स्वीकार्य थी। उन्होंने शिक्षण के साथ-साथ राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाई और बड़े नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश की आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उन्होंने कहा कि नवंबर 1919 में जमीयत उलमा-ए-हिंद की स्थापना हुई और मुफ़्ती ए आज़म इसके प्रथम अस्थायी अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने संगठन की मज़बूती और आज़ादी की लड़ाई में मिसाल कायम करने वाली क़ुर्बानियाँ दीं। हज़रत शेख़ुल हिंदؒ का यह कथन उनकी महानता का प्रमाण है— *“जमात को मुफ़्ती किफायतुल्लाह और मौलाना हबीबुर्रहमान उस्मानी को कभी नहीं छोड़ना चाहिए… तुम लोग सियासतदान हो और किफायतुल्लाह का दिमाग़ सियासतसाज़ है।
मौलाना अरशद मदनी का संबोधन
अमीर-ए-हिंद मौलाना सैयद अरशद मदनी ने कहा कि मुफ़्ती मोहम्मद किफायतुल्लाहؒ, हज़रत शेख़ुल हिंदؒ की तहरीक के सच्चे अमीन थे। उनका ज्ञान इतना गहरा था कि बड़े-बड़े उलेमा भी उनकी इल्मी गहराई के सामने नतमस्तक हो जाते थे। कठिन विषयों को कुछ वाक्यों में समेट देना उनकी विशेष क्षमता थी। उनकी लेखनी इतनी प्रबल और सटीक होती कि उसमें संशोधन की कोई गुंजाइश नहीं रहती थी। वह जमीयत की बुनियाद रखने वाली तहरीक के केंद्रीय स्तंभ थे, इसलिए उन्हें संगठन का पहला कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया।
विशिष्ट अतिथि
आज की दोनों बैठकों में विशेष अतिथियों के रूप में शामिल हुए—
मौलाना सैयद अरशद मदनी, मौलाना सैयद तनवीर अहमद हाशमी (कर्नाटक), मौलाना अतीक अहमद बस्तवी (नदवा), क़ासिम रसूल इलियास (AIMPLB), जनाब मोहम्मद अहमद (जमाअत इस्लामी हिंद), मौलाना मुफ़्ती इब्राहिम रिजवी (श्रीलंका), मौलाना ख़ालिद सिद्दीकी (नेपाल), मौलाना नियाज़ अहमद फ़ारूकी, हज़रत मुफ़्ती ए आज़मؒ के पौत्र डॉ. मोहम्मद क़ासिम देहलवी, मौलाना अनीस अहमद कासमी, जनाब मोहम्मद सालिम देहलवी, मौलाना अहमद सईद देहलवीؒ के सुपुत्र राशिद सईद देहलवी सहित कई महत्वपूर्ण शख्सियतें।
ये रहे मौजूद
मौलाना मुफ़्ती रियासत अली कासमी (अमरोहा), मौलाना मुफ़्ती मोहम्मद ताहिर (मुरादाबाद), मोहम्मद कलीमुल्लाह (मुरादाबाद), मौलाना इमरान लिल्लाह कासमी (देवबंद), मौलाना फैसल अहमद भटकल्ली (नदवा), मुफ़्ती अबू जंदल कासमी, हाफ़िज़ महमूद ज़िया खैराबादी, मुफ़्ती मोहम्मद अजमल कासमी (मुरादाबाद), मुफ़्ती अता उल्लाह कोपागंज, मौलाना मुफ़्ती सईदुज़्ज़फ़र कासमी (रामपुर), मुफ़्ती मोहम्मद इब्राहिम (मुरादाबाद), मौलाना मोहम्मद अल्लाह खलीली (देवबंद), डॉ. मोहम्मद याक़ूब कासमी, मुफ़्ती अइनुल हक़ अमीनी, मौलाना अज़ीमुर्रहमान कासमी (ग़ाज़ीपुर), मुफ़्ती इश्तियाक़ अहमद दरभंगवी, मौलाना इमदादुल्लाह मऊवी (मऊ), मौलाना अनवार अहमद खैराबादी, मुफ़्ती उसामा अज़ीम शाहजहाँपुरी, मुफ़्ती शरफ़ुद्दीन कासमी, मौलाना इब्नुल हसन कासमी, मुफ़्ती मोहम्मद यूसुफ़ कासमी (मेवात), मुफ़्ती मोहम्मद जुनैद कासमी (गंज मुरादाबाद), मौलाना मुफ़्ती अता-उर-रहमान कासमी, मौलाना मोहम्मद मुजतबा कासमी (हसनपुर), मौलाना शाहिद खरसावी, मौलाना इज़हारुल हक़ कासमी (दारुल उलूम वक़्फ़), मौलाना शोएब अली कासमी (भागलपुर), मौलाना सदाक़त अली (मदरसा अमीनिया)