अफवाहों के साये में पोल्ट्री सेक्टर, चिकन और अंडों पर फैली गलतफहमियों को विशेषज्ञों ने बताया निराधार
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नई दिल्ली: देश का पोल्ट्री सेक्टर इस समय किसी बीमारी, उत्पादन संकट या आपूर्ति की कमी से नहीं, बल्कि तेजी से फैल रही अफवाहों और भ्रामक जानकारियों के कारण गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। ‘Vets in Poultry (VIP)’ संगठन से जुड़े पशु चिकित्सा विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि चिकन और अंडे न केवल पूरी तरह सुरक्षित हैं, बल्कि आम लोगों के लिए सबसे सस्ते, सुलभ और उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर फैली गलत सूचनाएं लोगों के मन में डर और भ्रम पैदा कर रही हैं, जिसका सीधा असर इस पूरे क्षेत्र पर पड़ रहा है।
करीब 1,700 पशु चिकित्सकों और विशेषज्ञों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस संगठन ने एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि देशभर में चिकन और अंडों को लेकर 200 से अधिक मिथक फैल चुके हैं। इन मिथकों में हार्मोन और एंटीबायोटिक के उपयोग, बर्ड फ्लू के खतरे, अंडों की गुणवत्ता, पोषण संबंधी भ्रम और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे कई मुद्दे शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से ज्यादातर बातें वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि अधूरी जानकारी या अफवाहों का परिणाम हैं।
संगठन के अध्यक्ष अजय देशपांडे ने कहा, “पोल्ट्री सेक्टर केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि देश की पोषण सुरक्षा का मजबूत स्तंभ है। चिकन और अंडे उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, विटामिन और खनिजों से भरपूर होते हैं, जो हर वर्ग के लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे में इनके बारे में फैल रही भ्रामक जानकारी न केवल उत्पादकों को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि आम जनता को भी सस्ते और पौष्टिक भोजन से दूर कर देती है।”
आज के डिजिटल युग में जानकारी जितनी तेजी से फैलती है, उतनी ही तेजी से गलत जानकारी भी लोगों तक पहुंच जाती है। पोल्ट्री सेक्टर इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। कभी बर्ड फ्लू के नाम पर डर फैलाया जाता है, तो कभी ‘प्लास्टिक अंडे’ जैसी अफवाहें वायरल हो जाती हैं। कई बार एक वीडियो या मैसेज के वायरल होते ही बाजार में चिकन और अंडों की मांग अचानक गिर जाती है। इसका सीधा असर उन किसानों पर पड़ता है, जो पहले से सीमित संसाधनों के साथ मेहनत कर रहे होते हैं। कीमतें गिर जाती हैं, सप्लाई चेन प्रभावित होती है और उनकी आय पर गहरा असर पड़ता है।
विशेषज्ञों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई आम मिथकों को तथ्यों के साथ खारिज किया।सबसे ज्यादा फैलने वाला मिथक यह है कि चिकन में ग्रोथ हार्मोन का इस्तेमाल किया जाता है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह न तो व्यावहारिक है और न ही आर्थिक रूप से संभव। इसके अलावा, दुनिया भर में पोल्ट्री में इस तरह के हार्मोन के उपयोग की अनुमति भी नहीं है।इसी तरह, एंटीबायोटिक के इस्तेमाल को लेकर भी भ्रम है। हकीकत यह है कि इसका उपयोग सख्त नियमों और निगरानी के तहत ही किया जाता है, ताकि उपभोक्ताओं की सुरक्षा बनी रहे।
अंडों को लेकर भी कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं, जैसे भूरे और सफेद अंडों के पोषण में अंतर होना। वैज्ञानिक दृष्टि से दोनों ही समान रूप से पौष्टिक होते हैं। ‘प्लास्टिक अंडे’ जैसी बातें भी पूरी तरह अफवाह हैं, जिनका कोई वास्तविक आधार नहीं है।
इसके अलावा, यह धारणा भी गलत है कि बुखार या बीमारी के दौरान अंडा नहीं खाना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि अंडा प्रोटीन का अच्छा स्रोत है और शरीर को जल्दी ठीक होने में मदद करता है, हालांकि किसी विशेष स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी होता है।
बर्ड फ्लू को लेकर फैली घबराहट पर भी विशेषज्ञों ने स्थिति साफ की। उनका कहना है कि यदि चिकन और अंडों को अच्छी तरह पकाया जाए, तो वे पूरी तरह सुरक्षित होते हैं। कच्चे या अधपके उत्पादों से बचना ही पर्याप्त सावधानी है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में पोल्ट्री सेक्टर लगातार प्रगति कर रहा है। वर्ष 2024-25 में देश में अंडा उत्पादन 149.11 अरब तक पहुंच गया है। वहीं, प्रति व्यक्ति अंडों की उपलब्धता 2014-15 के 62 अंडे प्रति वर्ष से बढ़कर 106 अंडे प्रति वर्ष हो गई है। पोल्ट्री मांस उत्पादन 5.18 मिलियन टन है, जो देश के कुल मांस उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा है।
पोल्ट्री सेक्टर केवल पोषण ही नहीं, बल्कि रोजगार का भी बड़ा स्रोत है। लाखों किसान, मजदूर और छोटे व्यवसायी इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में अफवाहों का असर सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सीधे तौर पर लोगों की आजीविका को प्रभावित करता है।
विशेषज्ञों ने सरकार, मीडिया और आम जनता से अपील की है कि वे सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक जानकारियों से सतर्क रहें और केवल वैज्ञानिक तथा प्रमाणित स्रोतों पर ही भरोसा करें। उनका कहना है कि यदि समय रहते इन अफवाहों पर रोक नहीं लगाई गई, तो इसका असर देश की पोषण सुरक्षा और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था दोनों पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।