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  • गैंगस्टर के दोषी को तीन वर्ष 11 माह की कैद

    गैंगस्टर के दोषी को तीन वर्ष 11 माह की कैद

    कैरना (शामली)। एडीजे फास्ट ट्रैक कोर्ट ने गैंगस्टर एक्ट के मामले में एक दोषी को तीन वर्ष 11 माह के कारावास की सजा सुनाई है।

    बता दें कि वर्ष 2003 में बाबरी थाने पर प्रमेंद्र निवासी हाथी करौदा के विरुद्ध गैंगस्टर अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था। मामले में पुलिस ने आरोपी के विरूद्ध चार्जशीट कोर्ट में दाखिल कर दी थी। सोमवार शाम लगभग साढ़े सात बजे पुलिस ने बताया कि उक्त मामले में कैराना स्थित एडीजे फास्ट ट्रैक कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार दिया, जिस पर दोषी को तीन वर्ष 11 माह के कारावास और छह हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई। अर्थदंड अदा नहीं करने पर एक माह के अतिरिक्त कारावास की सजा का प्रावधान किया गया है।

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  • अफवाहों के साये में पोल्ट्री सेक्टर, चिकन और अंडों पर फैली गलतफहमियों को विशेषज्ञों ने बताया निराधार

    अफवाहों के साये में पोल्ट्री सेक्टर, चिकन और अंडों पर फैली गलतफहमियों को विशेषज्ञों ने बताया निराधार

    नई दिल्ली: देश का पोल्ट्री सेक्टर इस समय किसी बीमारी, उत्पादन संकट या आपूर्ति की कमी से नहीं, बल्कि तेजी से फैल रही अफवाहों और भ्रामक जानकारियों के कारण गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। ‘Vets in Poultry (VIP)’ संगठन से जुड़े पशु चिकित्सा विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि चिकन और अंडे न केवल पूरी तरह सुरक्षित हैं, बल्कि आम लोगों के लिए सबसे सस्ते, सुलभ और उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर फैली गलत सूचनाएं लोगों के मन में डर और भ्रम पैदा कर रही हैं, जिसका सीधा असर इस पूरे क्षेत्र पर पड़ रहा है।

    करीब 1,700 पशु चिकित्सकों और विशेषज्ञों का प्रतिनिधित्व करने वाले इस संगठन ने एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि देशभर में चिकन और अंडों को लेकर 200 से अधिक मिथक फैल चुके हैं। इन मिथकों में हार्मोन और एंटीबायोटिक के उपयोग, बर्ड फ्लू के खतरे, अंडों की गुणवत्ता, पोषण संबंधी भ्रम और पर्यावरणीय प्रभाव जैसे कई मुद्दे शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से ज्यादातर बातें वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं, बल्कि अधूरी जानकारी या अफवाहों का परिणाम हैं।

    संगठन के अध्यक्ष अजय देशपांडे ने कहा, “पोल्ट्री सेक्टर केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि देश की पोषण सुरक्षा का मजबूत स्तंभ है। चिकन और अंडे उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन, विटामिन और खनिजों से भरपूर होते हैं, जो हर वर्ग के लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध हैं। ऐसे में इनके बारे में फैल रही भ्रामक जानकारी न केवल उत्पादकों को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि आम जनता को भी सस्ते और पौष्टिक भोजन से दूर कर देती है।”

    आज के डिजिटल युग में जानकारी जितनी तेजी से फैलती है, उतनी ही तेजी से गलत जानकारी भी लोगों तक पहुंच जाती है। पोल्ट्री सेक्टर इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है। कभी बर्ड फ्लू के नाम पर डर फैलाया जाता है, तो कभी ‘प्लास्टिक अंडे’ जैसी अफवाहें वायरल हो जाती हैं। कई बार एक वीडियो या मैसेज के वायरल होते ही बाजार में चिकन और अंडों की मांग अचानक गिर जाती है। इसका सीधा असर उन किसानों पर पड़ता है, जो पहले से सीमित संसाधनों के साथ मेहनत कर रहे होते हैं। कीमतें गिर जाती हैं, सप्लाई चेन प्रभावित होती है और उनकी आय पर गहरा असर पड़ता है।

    विशेषज्ञों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई आम मिथकों को तथ्यों के साथ खारिज किया।सबसे ज्यादा फैलने वाला मिथक यह है कि चिकन में ग्रोथ हार्मोन का इस्तेमाल किया जाता है। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह न तो व्यावहारिक है और न ही आर्थिक रूप से संभव। इसके अलावा, दुनिया भर में पोल्ट्री में इस तरह के हार्मोन के उपयोग की अनुमति भी नहीं है।इसी तरह, एंटीबायोटिक के इस्तेमाल को लेकर भी भ्रम है। हकीकत यह है कि इसका उपयोग सख्त नियमों और निगरानी के तहत ही किया जाता है, ताकि उपभोक्ताओं की सुरक्षा बनी रहे।

    अंडों को लेकर भी कई तरह की गलतफहमियां फैली हुई हैं, जैसे भूरे और सफेद अंडों के पोषण में अंतर होना। वैज्ञानिक दृष्टि से दोनों ही समान रूप से पौष्टिक होते हैं। ‘प्लास्टिक अंडे’ जैसी बातें भी पूरी तरह अफवाह हैं, जिनका कोई वास्तविक आधार नहीं है।

    इसके अलावा, यह धारणा भी गलत है कि बुखार या बीमारी के दौरान अंडा नहीं खाना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि अंडा प्रोटीन का अच्छा स्रोत है और शरीर को जल्दी ठीक होने में मदद करता है, हालांकि किसी विशेष स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी होता है।

    बर्ड फ्लू को लेकर फैली घबराहट पर भी विशेषज्ञों ने स्थिति साफ की। उनका कहना है कि यदि चिकन और अंडों को अच्छी तरह पकाया जाए, तो वे पूरी तरह सुरक्षित होते हैं। कच्चे या अधपके उत्पादों से बचना ही पर्याप्त सावधानी है।

    सरकारी आंकड़े बताते हैं कि भारत में पोल्ट्री सेक्टर लगातार प्रगति कर रहा है। वर्ष 2024-25 में देश में अंडा उत्पादन 149.11 अरब तक पहुंच गया है। वहीं, प्रति व्यक्ति अंडों की उपलब्धता 2014-15 के 62 अंडे प्रति वर्ष से बढ़कर 106 अंडे प्रति वर्ष हो गई है। पोल्ट्री मांस उत्पादन 5.18 मिलियन टन है, जो देश के कुल मांस उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा है।

    पोल्ट्री सेक्टर केवल पोषण ही नहीं, बल्कि रोजगार का भी बड़ा स्रोत है। लाखों किसान, मजदूर और छोटे व्यवसायी इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में अफवाहों का असर सिर्फ बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सीधे तौर पर लोगों की आजीविका को प्रभावित करता है।

    विशेषज्ञों ने सरकार, मीडिया और आम जनता से अपील की है कि वे सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक जानकारियों से सतर्क रहें और केवल वैज्ञानिक तथा प्रमाणित स्रोतों पर ही भरोसा करें। उनका कहना है कि यदि समय रहते इन अफवाहों पर रोक नहीं लगाई गई, तो इसका असर देश की पोषण सुरक्षा और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था दोनों पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।

इस्लामिक समाचार

  • नंगलाराई के मदरसे में जलसे का आयोजन

    नंगलाराई के मदरसे में जलसे का आयोजन

    मुजफ्फरनगर (विशेष संवाददाता): 

    दारुल उलूम देवबंद के पूर्व शेख़ुल कुर्रा और राब्ता आलम—ए—इस्लामी मक्का मुकर्रमा के सदस्य कारी अल-मुकरी अबुल हसन आज़मी ने कहा है कि कुरआन—ए—करीम पर अमल करो, इससे पहले कि यह पवित्र किताब तुम्हारे सीनों से मिट जाए और तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाए। यही वह वक्त होगा जब कोई नेक अमल इंसान के काम नहीं आएगा। कारी अल—मुकरी अबुल हसन आज़मी मुजफ्फरनगर जिले के गांव नंगलाराई स्थित मदरसा दारुल किरात हसनिया में 18 हाफ़िज़े कुरान की दस्तारबंदी के मौके पर आयोजित जलसे की आखिरी मजलिस से खिताब कर रहे थे। 

    जामिया बदरुल उलूम गढ़ी दौलत के उस्ताद—ए—हदीस मुफ्ती खालिद कासमी ने कहा कि इंसान जब दुनिया से रुख्सत होता है तो उसके तीन अमल ऐसे हैं जो मरने के बाद भी काम आते रहते हैं, इनमें सदका-ए-जारिया, नफ़ा पहुंचाने वाला इल्मी सरमाया और नेक औलाद। अफसोस की बात है कि हम इन तीनों क्षेत्रों पर बहुत कम ध्यान देते हैं। खास तौर पर औलाद का मसला इतना गंभीर होता जा रहा है कि माता—पिता ने औलाद की निगरानी और तरबियत से पूरी तरह मुंह फेर लिया है।

    इशाअतुल उलूम के मोहतमिम मुफ्ती नसीम कासमी ने कहा कि जब बुनियादी अकीदा ही कमज़ोर हो जाता है तो सारे अमल उसी तरह कमज़ोर होते चले जाते हैं। उन्होंने कहा कि तौहीद व रिसालत, आखिरत, तकदीर और आस्मानी किताबें जैसे बुनियादी अकीदा हमारे ईमान का लाज़िमी हिस्सा हैं। इन अकीदों की सही तालीम से हम गफलत कर रहे हैं, जिसकी वजह से हम बतौर मुसलमान आमाल सालेहा से बहुत पीछे हैं। उन्होंने कहा कि अल्लाह की सिफात, कुदरत तथा रसूल की रिसालत और आखिरत पर जितना मज़बूत ईमान होगा, उतना ही इंसान अपनी ज़िंदगी को नेक सांचे में ढालेगा।

    मुफ्ती अहमद ने कहा कि अगर इंसान हराम काम से बचने की ठान ले तो बड़ा इबादत गुजार बन जाए, क्योंकि यही चीज़ फसाद की जड़ होती है। उन्होंने कहा कि झूठ, वादा खिलाफी और खयानत जैसे हराम कामों से अगर हम बचने लगें तो हमारा दिल साफ और शफ्फाफ हो जाएगा। मौलाना ने कहा कि अंदरूनी बीमारियों जैसे हसद, बुग्ज़, कीना और तकब्बुर से भी सच्ची तौबा करनी होगी, तभी हम दुनिया और आखिरत में कामयाब हो सकेंगे। उन्होंने तालीम, सुन्नत की पाबंदी और ज़रूरी इल्म हासिल करने पर भी ज़ोर दिया।

    मौलवी साकिब सिराज कासमी ने उलेमा की सोहबत और उसके फायदों पर रोशनी डाली।

    जलसे की एक मजलिस में मदरसे के रूह-ए-रवां और अरबी ज़बान के इंशापर्दाज़ मुफ्ती मुहम्मद बिलाल कासमी ने कारी अबुल हसन आज़मी को सिपास नामा पेश करते हुए कहा कि कारी अल-मुकरी अबुल हसन आज़मी ने तजवीद और किरात के फन पर सौ से ज़्यादा किताबें लिखकर इल्मी दुनिया को हैरत में डाल दिया है। कारी मोहतरम की पूरी ज़िंदगी दर्स व तदरीस में गुज़री है, अभी भी वह तलबा को फन से रोशनास कराते रहते हैं। वह राब्ता आलम—ए—इस्लामी मक्का मुकर्रमा के सदस्य हैं। कारी मोहतरम खुद एक मिशन हैं, जिनके हज़ारों शागिर्दाने रशीद उनके फन की आबियारी में मसरूफ हैं। इससे पहले हाफ़िज़ फरमान, मुहम्मद अहमद, फहद, शायान, उमर, अरमान, सलमान और चांद समेत 18 हाफ़िज़—ए—कुरान तलबा की उलेमा-ए-किराम के हाथों दस्तारबंदी हुई। इस मौके पर मौलाना इरशाद अकाबी ने मदारिस और कुरान के ताल्लुक से बयान किया। वहीं, मदरसे के तलबा व तालिबात ने इस्लाही मुकालमे, नज़्में और हालाते हाज़िरा के ताल्लुक से तकारीर भी पेश कीं। अंत में मदरसे के मोहतमिम कारी मुहम्मद शहज़ाद ने हाज़िरीन का शुक्रिया अदा किया। यह जलसा बुज़ुर्ग आलिम—ए—दीन मौलाना मुहम्मद इलियास की दुआ पर संपन्न हुआ। दोनों मजलिसों की निज़ामत मुफ्ती मुहम्मद बिलाल कासमी और मौलाना साकिब सिराज ने संयुक्त रूप से की।

    जलसे में मिफ्ताहुल उलूम के उस्ताद—ए—हदीस मुफ्ती रईस अहमद, दारुल उलूम देवबंद से मौलाना मुकीम, मौलाना मूसा कासमी, मौलाना सलीम, कारी नौशाद, कारी दिलशाद, कारी वसीम, शाहिद भाई, मुहम्मद इरशाद, मेराज अहमद, मुनीर अहमद, मौलाना जाबिर, हाफ़िज़ फुरकान असअदी, कारी आज़म, कारी सुहैल, कारी साकिब, कारी फैसल, कारी शुऐब, हाजी मुकीम और जावेद आदि खास तौर पर मौजूद रहे।


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