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मुजफ्फरनगर (विशेष संवाददाता):
दारुल उलूम देवबंद के पूर्व शेख़ुल कुर्रा और राब्ता आलम—ए—इस्लामी मक्का मुकर्रमा के सदस्य कारी अल-मुकरी अबुल हसन आज़मी ने कहा है कि कुरआन—ए—करीम पर अमल करो, इससे पहले कि यह पवित्र किताब तुम्हारे सीनों से मिट जाए और तौबा का दरवाज़ा बंद हो जाए। यही वह वक्त होगा जब कोई नेक अमल इंसान के काम नहीं आएगा। कारी अल—मुकरी अबुल हसन आज़मी मुजफ्फरनगर जिले के गांव नंगलाराई स्थित मदरसा दारुल किरात हसनिया में 18 हाफ़िज़े कुरान की दस्तारबंदी के मौके पर आयोजित जलसे की आखिरी मजलिस से खिताब कर रहे थे।
जामिया बदरुल उलूम गढ़ी दौलत के उस्ताद—ए—हदीस मुफ्ती खालिद कासमी ने कहा कि इंसान जब दुनिया से रुख्सत होता है तो उसके तीन अमल ऐसे हैं जो मरने के बाद भी काम आते रहते हैं, इनमें सदका-ए-जारिया, नफ़ा पहुंचाने वाला इल्मी सरमाया और नेक औलाद। अफसोस की बात है कि हम इन तीनों क्षेत्रों पर बहुत कम ध्यान देते हैं। खास तौर पर औलाद का मसला इतना गंभीर होता जा रहा है कि माता—पिता ने औलाद की निगरानी और तरबियत से पूरी तरह मुंह फेर लिया है।
इशाअतुल उलूम के मोहतमिम मुफ्ती नसीम कासमी ने कहा कि जब बुनियादी अकीदा ही कमज़ोर हो जाता है तो सारे अमल उसी तरह कमज़ोर होते चले जाते हैं। उन्होंने कहा कि तौहीद व रिसालत, आखिरत, तकदीर और आस्मानी किताबें जैसे बुनियादी अकीदा हमारे ईमान का लाज़िमी हिस्सा हैं। इन अकीदों की सही तालीम से हम गफलत कर रहे हैं, जिसकी वजह से हम बतौर मुसलमान आमाल सालेहा से बहुत पीछे हैं। उन्होंने कहा कि अल्लाह की सिफात, कुदरत तथा रसूल की रिसालत और आखिरत पर जितना मज़बूत ईमान होगा, उतना ही इंसान अपनी ज़िंदगी को नेक सांचे में ढालेगा।
मुफ्ती अहमद ने कहा कि अगर इंसान हराम काम से बचने की ठान ले तो बड़ा इबादत गुजार बन जाए, क्योंकि यही चीज़ फसाद की जड़ होती है। उन्होंने कहा कि झूठ, वादा खिलाफी और खयानत जैसे हराम कामों से अगर हम बचने लगें तो हमारा दिल साफ और शफ्फाफ हो जाएगा। मौलाना ने कहा कि अंदरूनी बीमारियों जैसे हसद, बुग्ज़, कीना और तकब्बुर से भी सच्ची तौबा करनी होगी, तभी हम दुनिया और आखिरत में कामयाब हो सकेंगे। उन्होंने तालीम, सुन्नत की पाबंदी और ज़रूरी इल्म हासिल करने पर भी ज़ोर दिया।
मौलवी साकिब सिराज कासमी ने उलेमा की सोहबत और उसके फायदों पर रोशनी डाली।
जलसे की एक मजलिस में मदरसे के रूह-ए-रवां और अरबी ज़बान के इंशापर्दाज़ मुफ्ती मुहम्मद बिलाल कासमी ने कारी अबुल हसन आज़मी को सिपास नामा पेश करते हुए कहा कि कारी अल-मुकरी अबुल हसन आज़मी ने तजवीद और किरात के फन पर सौ से ज़्यादा किताबें लिखकर इल्मी दुनिया को हैरत में डाल दिया है। कारी मोहतरम की पूरी ज़िंदगी दर्स व तदरीस में गुज़री है, अभी भी वह तलबा को फन से रोशनास कराते रहते हैं। वह राब्ता आलम—ए—इस्लामी मक्का मुकर्रमा के सदस्य हैं। कारी मोहतरम खुद एक मिशन हैं, जिनके हज़ारों शागिर्दाने रशीद उनके फन की आबियारी में मसरूफ हैं। इससे पहले हाफ़िज़ फरमान, मुहम्मद अहमद, फहद, शायान, उमर, अरमान, सलमान और चांद समेत 18 हाफ़िज़—ए—कुरान तलबा की उलेमा-ए-किराम के हाथों दस्तारबंदी हुई। इस मौके पर मौलाना इरशाद अकाबी ने मदारिस और कुरान के ताल्लुक से बयान किया। वहीं, मदरसे के तलबा व तालिबात ने इस्लाही मुकालमे, नज़्में और हालाते हाज़िरा के ताल्लुक से तकारीर भी पेश कीं। अंत में मदरसे के मोहतमिम कारी मुहम्मद शहज़ाद ने हाज़िरीन का शुक्रिया अदा किया। यह जलसा बुज़ुर्ग आलिम—ए—दीन मौलाना मुहम्मद इलियास की दुआ पर संपन्न हुआ। दोनों मजलिसों की निज़ामत मुफ्ती मुहम्मद बिलाल कासमी और मौलाना साकिब सिराज ने संयुक्त रूप से की।
जलसे में मिफ्ताहुल उलूम के उस्ताद—ए—हदीस मुफ्ती रईस अहमद, दारुल उलूम देवबंद से मौलाना मुकीम, मौलाना मूसा कासमी, मौलाना सलीम, कारी नौशाद, कारी दिलशाद, कारी वसीम, शाहिद भाई, मुहम्मद इरशाद, मेराज अहमद, मुनीर अहमद, मौलाना जाबिर, हाफ़िज़ फुरकान असअदी, कारी आज़म, कारी सुहैल, कारी साकिब, कारी फैसल, कारी शुऐब, हाजी मुकीम और जावेद आदि खास तौर पर मौजूद रहे।