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सोनीपत (हरियाणा): मौलाना अब्दुल अली हसनी नदवी लखनवी ने कहा है कि इस्लामी शिक्षाओं को इस स्तर तक अपनाया जाए कि देश के गैर-मुसलमान भाई मुसलमानों को इस्लाम धर्म का जीवंत नमूना समझने लगें। यह तभी संभव होगा जब हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को पैग़म्बर के तरीके के अनुसार ढालेंगे। मौलाना सोनीपत के जामिया खैरुन्निसा फाउंडेशन में “पैग़ाम-ए-इंसानियत” के शीर्षक से आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि गैर-मुसलमान भाई हमारे देशवासी हैं और उनके साथ नैतिकता व व्यवहार में सौ प्रतिशत सहानुभूति का प्रदर्शन होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई हमारी बातचीत सुने तो वह खुद कह उठे कि यह मुसलमान है, यह झूठ नहीं बोलेगा। कोई समझौता करने वाला यह समझे कि यह पैग़म्बर का अनुयायी है, इसलिए यह वादा नहीं तोड़ेगा। कोई अपनी अमानत उसके पास रखे तो उसे यकीन हो कि यह अल्लाह के रसूल का अनुयायी है, इसलिए यह बेईमानी नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि जब हमारी हालत ऐसी हो जाएगी, तभी हम सही मायनों में धर्म का व्यावहारिक नमूना बन सकेंगे और उसी समय आम आदमी इस्लाम धर्म की ओर आकर्षित होगा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि धोखेबाज़ी, झूठ और गद्दारी जैसे बुरे कामों से अब काम नहीं चलने वाला, क्योंकि इससे इस्लाम और मुसलमान दोनों की बेइज़्ज़ती होती है।
मौलाना अब्दुल अली हसनी नदवी ने इस्लामी इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि श्रेष्ठ पीढ़ियों के समय में पहचान पैग़म्बरी तरीके पर चलने वाले इंसान के रूप में होती थी। वह दौर ऐसा था जब मस्जिद की ज़िंदगी और बाज़ार की ज़िंदगी एक जैसी होती थी। जिस चीज़ से मस्जिद में बचाव की दुआ की जाती थी, उस पर बाहर आकर भी अमल नहीं किया जाता था। आज हालात बदल चुके हैं। मस्जिद में जिस तरह की ज़िंदगी का हम प्रदर्शन करते हैं, बाहर निकलते ही सब कुछ बदल जाता है, इसी वजह से आज चारों ओर उम्मत पर गिरावट, पतन और दुर्दशा छाई हुई है।
लखनऊ से उनके साथ आए मौलाना मोहम्मद मियां ने कहा कि दुनिया के मार्गदर्शक हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और उनके सहाबा की ज़िंदगी इस बात की गवाह है कि मुसलमान का कथन और कर्म एक-सा हुआ करता था। उन्होंने कहा कि झूठ, बेईमानी और वादा-खिलाफी को इस्लाम में मुनाफ़िक़ की निशानी बताया गया है। मानव कल्याण के कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें हम देश के भाइयों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण काम कर सकते हैं।
इस पूरे कार्यक्रम के आयोजक और मुख्य प्रेरक खलीफा-ए-मुजाज़ मौलाना जमशेद अली नदवी ने कहा कि “पैग़ाम-ए-इंसानियत” ऐसा विषय है जिसमें इंसानी जीवन के व्यवहारिक पहलुओं को देखा जाता है। उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश होगी कि इस विषय पर मस्जिद दर मस्जिद और मोहल्ला स्तर पर बैठकें की जाएं। उन्होंने साफ कहा कि इसके लिए बड़े जलसे, बड़ी कॉन्फ्रेंस या बड़े सेमिनार की कोई ज़रूरत नहीं है, बल्कि ऐसे कार्यक्रम गांव और कस्बों के स्तर पर मोहल्ला-दर-मोहल्ला होने चाहिए।
ज्ञात रहे कि इस प्रतिनिधिमंडल ने मलेरकोटला, समराला, खन्ना और जींद आदि स्थानों का भी दौरा किया। इस अवसर पर कारी मोहम्मद ज़ीशान कादरी, कारी मोहम्मद नसीम, इमाम हारून समालखा, मौलाना अरशद नदवी, कारी उम्मीद अली और मौलाना महफूज़ रशीदी आदि मौजूद रहे।